प्रेम की ललक
भाग 2
सुबह जैसी ही नींद खुली पुष्पिता की नजर टेबल पर रखे उस पत्र पर पड़ी जिसमें पुष्पिता ने श्यामदेव के लिए बहुत कुछ सजों कर रखा है l कोई उसके कमरे में आए और उसकी नजर पत्र पर पड़ जाए इससे पहले उसने पत्र को अपनी नोटबुक के अंदर छिपा लिया l थोड़ी देर खामोश होकर रात के बारे में सोचने लगी आखिर क्यों इतनी तड़प और दूरियां हैं , उसके और श्यामदेव के बीच l सारा परिवार और समाज प्रेम के विपरीत खड़ा था l रात भर सो कर भी उस पुष्पिता के प्रतिशोध की अग्नि अभी शांत नहीं हुई थी l घड़ी की तरफ देखा तो 7:00 बज चुके हैं l देर हो रहा था इसलिए तुरंत उठी और झटपट अपने दिनचर्या में लग गई l
आज कॉलेज थोड़ा वक्त से पहले जाना चाहती थी मगर मां को भनक ना लग जाए इसलिए कोई बहाना भी नहीं बना सकती l
आईने के सामने बैठकर सजना चाहती थी अपने बालों को संवारना चाहती थी l मगर आईने में खुद का प्रतिबिंब उसे यह सब करने से रोक देता था l काजल की डिबिया भी उसे जरा सी कालिख पोतने से रोकती है l साज-सज्जा के सामान शायद पुष्पिता के किसी काम के नहीं थे l फिर भी बालों का जुड़ा बनाने के बाद , चुटकी भर बाल बाहर की तरफ खींचकर दोनों तरफ लटें बना थी l और हाँ..घर से निकलते वक्त लटों को हमेशा कानों के पीछे छिपा लेती थी l श्यामदेव को इन्हीं लटों से तो रिझाती थी l
आज कालेज के इसके लिए पहले निकलना चाहती थी लेकिन लेट हो गया था l
"आज कॉलेज जाने का इरादा नहीं है क्या ? " मां ने हड़बड़ी में कहा, और प्लेट में दो पराठे रख कर चली गयीं l
पुष्पिता भी फटाफट नोटबुक और कलम बैग में रखकर निकलने वाली थी, कि अचानक उसे कुछ याद आया l बैग को हाथ में दबाकर उसने चेन को जल्दीबाजी में खोला और नोटबुक को वापस निकाल कर पन्नों को रफ्तार में पलटते हुए उसने सुनिश्चित कर लिया कि पत्र है या नहीं l
कालेज महज 15 मिनट की दूरी पर था l पुष्पिता उस दिन अपनी सहेली के घर भी नहीं गई l कालेज की नोटिस बोर्ड पर देखा तो तीन कक्षाएं ही चलनी थीं l यह देखकर पुष्पिता चेहरे पर खुशी आ गई l
"आज बहुत खुश लग रही हो क्या बात है,.....लगता है आज सुबह-सुबह ही राधा अपने कृष्ण से मिलकर आई है..." अनामिका ने मजाकिया लहजे में पुष्पिता से कहा l
मुस्कुराते हुए पुष्पिता ने कहा "चलो क्लास के लिए देर हो रही है"....
आज पूरी कक्षा में श्यामदेव के बारे में सोचती रही l लेक्चर भी ध्यान से नहीं सुन रही थी l एक-आध शब्द जो सुन पा रही थी ,उसे अपने नोटबुक पर घसीट कर लिखती जा रही थी....जैसे फिर कभी उन पन्नों का पलटना ही ना हो l
बार-बार कलाई पर लगी घड़ी की तरफ देख रही थी l जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा था, मिलने की उत्कंठा तीव्र होती जा रही थी l अब एक-एक मिनट पुष्पिता के लिए पहाड़ सा होता जा रहा था l बारह बजे क्लास ओभर होते ही भागकर कालेज के गार्डन में गई l
यह वही जगह है जहां पर पुष्पिता और श्यामदेव अक्सर मिला करते हैं l
अपनी दो सहेलियों के साथ थोड़ा इंतजार करने के बाद दूर से ही श्यामदेव आता दिखा l श्यामदेव को देखकर उसकी सहेलियां शर्मा कर वहां से जाने लगीं l पुष्पिता के बार बार कहने पर भी रुकी नहीं l आखिर श्यामदेव का सामना अकेले ही पुष्पिता को करना पड़ा l
पत्र श्यामदेव के हाथ में देकर पुष्पिता जाने लगी l मगर श्यामदेव ने उसकी कलाई पकड़ कर अपनी तरफ खींचा l पुष्पिता ने भी शर्म से अपनी नजरें झुका ली l उंगलियों से लटों को सहेजते हुए श्यामदेव अभी कुछ कहना ही चाहता था, तभी पुष्पिता अपनी कलाई श्यामदेव के गिरफ्त से छुड़ाकर जाने लगी l
जैसे ही मुड़कर जाने लगी श्यामदेव ने धीरे से कहा - "कल फिर यहीं मिलेंगे....टाइम पर आ जाना"....पुष्पिता भी उसकी तरफ देख कर मुस्कुराई और जाने लगी l
जैसे जैसे पुष्पिता दूर जा रही थी उसके चेहरे की मुस्कान खामोशियों में तब्दील होने लगी l पुष्पिता के चेहरे पर पछतावा झलकने लगा l मन ही मन सोचने लगी हाथ नहीं छुड़ाना चाहिए था l कहीं ये हरकतें श्यामदेव को बुरी तो नहीं लगती होंगी ? तमाम प्रश्न पुष्पिता के मन में चल रहे थे l
श्यामदेव भी जब लटें सुलझाता है पुष्पिता शर्म से थोड़ी झुक जाती है l गालों पर उंगलियों के स्पर्श की अनुभूति होते ही क्षंणभर के लिए पुष्पिता की आंखें बंद हो जाती हैं l कलाई पर श्यामदेव की पकड़ और गालों पर वह क्षणिक स्पर्श के अनुभव को सारा दिन पुष्पिता महसूस करती रहती है l
श्यामदेव के स्पर्श को पुष्पिता क्षणभर के लिए नहीं ताउम्र महसूस करना चाहती थी l
-----अभिषेक तन्हा
Continued........ ...
भाग 1 :- https://abhishektanha.blogspot.com/2020/04/blog-post.html
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